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प्रदोष ( Pradosh)

 

प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है, जो हर माह की त्रयोदशी तिथि (दोनों पक्षों - कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष) के प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में रखा जाता है, जिसमें शिव-पार्वती की पूजा होती है और यह व्रत सभी कष्टों और दोषों को दूर कर मनोकामनाएं पूरी करता है, जिसमें बेलपत्रदूधधतूरा जैसी चीजें अर्पित की जाती हैं और फलहार किया जाता है, अन्न वर्जित होता है।  

महत्व (Significance):

  • शिव कृपा: 

यह व्रत भगवान शिव की विशेष कृपा दिलाता है और कलियुग में अत्यंत मंगलकारी माना जाता है। 

  • संकट मुक्ति: 

इस व्रत से जीवन के संकट, पाप और दुख दूर होते हैं। 

  • मनोकामना पूर्ति: 

विवाह, धन लाभ, संतान सुख जैसी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं। 

पूजा विधि (Puja Vidhi):

  1. स्नान: 

सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। 

  1. संकल्प: 

महादेव की पूजा कर व्रत का संकल्प लें। 

  1. संध्या पूजन (प्रदोष काल):
    • चौकी पर शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें। 
    • शिवलिंग पर बेलपत्र, गंगाजल, दूध, धतूरा, भस्म आदि चढ़ाएं (केतकी/केवड़ा वर्जित)। 
    • घी का दीपक जलाएं, आरती करें और "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करें। 
    • व्रत कथा पढ़ें। 
    • फल, मिठाई (साबूदाना, सिंघाड़े का आटा) का भोग लगाएं और प्रसाद बांटें। 

नियम (Rules): 

  • फलाहार: 

पूरे दिन अन्न का सेवन न करें, केवल फल या जल लें। शाम को पूजा के बाद फलाहार कर सकते हैं।

  • तामसिक भोजन वर्जित: 

घर में लहसुन, प्याज, मांस, मछली न बनाएं या खाएं।

  • संयुक्त पूजा: 

शिव की एकल पूजा के बजाय शिव-पार्वती की युगल पूजा करें।

दिन के अनुसार महत्व (Significance by Day):

  • बुध प्रदोष (बुधवार): 

व्यापार, बुद्धि और वाणी में सफलता देता है। 

  • शनि प्रदोष (शनिवार): 

संतान प्राप्ति के लिए उत्तम माना जाता है।