प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है,
जो हर माह
की त्रयोदशी तिथि (दोनों पक्षों - कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष) के प्रदोष काल
(सूर्यास्त के बाद का समय) में रखा जाता है, जिसमें शिव-पार्वती की पूजा होती है और यह व्रत सभी कष्टों और दोषों
को दूर कर मनोकामनाएं पूरी करता है, जिसमें बेलपत्र, दूध, धतूरा जैसी चीजें अर्पित की जाती हैं और फलहार किया जाता है, अन्न वर्जित होता है।
महत्व (Significance):
यह व्रत भगवान शिव की विशेष कृपा
दिलाता है और कलियुग में अत्यंत मंगलकारी माना जाता है।
इस व्रत से जीवन के संकट, पाप और दुख दूर होते हैं।
विवाह, धन लाभ, संतान सुख जैसी सभी इच्छाएं पूरी
होती हैं।
पूजा विधि (Puja Vidhi):
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और सूर्य
देव को अर्घ्य दें।
महादेव की पूजा कर व्रत का संकल्प
लें।
नियम (Rules):
पूरे दिन अन्न का सेवन न करें, केवल फल या जल लें। शाम को
पूजा के बाद फलाहार कर सकते हैं।
घर में लहसुन, प्याज, मांस, मछली न बनाएं या खाएं।
शिव की एकल पूजा के बजाय शिव-पार्वती
की युगल पूजा करें।
दिन के अनुसार महत्व (Significance
by Day):
व्यापार, बुद्धि और वाणी में सफलता देता है।
संतान प्राप्ति के लिए उत्तम माना
जाता है।